ऐसेही खामोशियां बढ़ती रही,
अचानक अल्फ़ाजो की कमि महसूस हुई।
क्या कहे कहने को कुछ बचा न था
क्या सच में दरार पड़ गई?
वह आदत जो कभी नजरंदाज की
अब नासूर बनकर तड़पाने लगी।
दिल में सुलगते हुए अरमानों की ज्वाला बन गई!
क्या सच में रिश्ते में दरार पड़ गई?
कभी साथ में चलते थे दोनों के कदम,
अब शौकिया चीज़ भी साथ रास ना आए।
अब बन गए हम नदी के दो किनारे, जो कभी साथ ना चल पाए!
क्या सच में रिश्ते में दरार पड़ गईं?
इसी सवाल को टटोलता है ये दिल,
जो नजर ना आए ऐसी लकीर खिंच गई।
ये कब और कैसे हुआ, ये समझने की चाह भी खो चुका दिल।
हा ये सच है –रिश्ते में दरार पड़ गईं!
